• Man Hee Puja Man Hee Dhoop

Man Hee Puja Man Hee Dhoop -मन ही पूजा मन ही धूप

एक दुर्घटना हुई है। और वह दुर्घटना है: मनुष्य की चेतना बहिर्मुखी हो गई है। सदियों से धीरे-धीरे यह हुआ, शनैः-शनैः, क्रमशः-क्रमशः। मनुष्य की आंखें बस बाहर थिर हो गई हैं, भीतर मुड़ना भूल गई हैं। तो कभी अगर धन से ऊब भी जाता है--और ऊबेगा ही कभी; कभी पद से भी आदमी ऊब जाता है--ऊबना ही पड़ेगा, सब थोथा है। कब तक भरमाओगे अपने को? भ्रम हैं तो टूटेंगे। छाया को कब तक सत्य मानोगे? माया का मोह कब तक धोखे देगा? सपनों में कब तक अटके रहोगे? एक न एक दिन पता चलता है सब व्यर्थ है। लेकिन तब भी एक मुसीबत खड़ी हो जाती है। वे जो आंखें बाहर ठहर गई हैं, वे आंखें अब भी बाहर ही खोजती हैं। धन नहीं खोजतीं, भगवान खोजती हैं--मगर बाहर ही। पद नहीं खोजतीं, मोक्ष खोजती हैं--लेकिन बाहर ही। विषय बदल जाता है, लेकिन तुम्हारी जीवन-दिशा नहीं बदलती। और परमात्मा भीतर है, यह अंतर्यात्रा है। जिसकी भक्ति उसे बाहर के भगवान से जोड़े हुए है, उसकी भक्ति भी धोखा है। मन ही पूजा मन ही धूप। चलना है भीतर! मन है मंदिर! उसी मन के अंतरगृह में छिपा हुआ बैठा है मालिक। 
ओशो

विषय सूची

प्रवचन 1 : आग ‍के फूल 
प्रवचन 2 : जीवन एक रहस्य है 
प्रवचन 3 : क्या तू सोया जाग अयाना 
प्रवचन 4 : मन माया है 
प्रवचन 5 : गाइ गाइ अब का कहि गाऊं 
प्रवचन 6 : आस्तिकता ‍के स्वर 
प्रवचन 7 : भगती ऐसी सुनहु रे भाई 
प्रवचन 8 : सत्संग की मदिरा 
प्रवचन 9 : संगति के परताप महातम 
प्रवचन 10 : आओ और डूबो 

 

 

 

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