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Kathopanishad - कठोपनिषद

मृत्यु, जिसे हम जीवन का अंत समझते हैं, उसी की चर्चा से प्रारंभ होता है यह कठोपनिषद। एक छोटे से बच्चे नचिकेता के निर्मल ‍हृदय की व्यथा जो क्रुद्ध पिता ‍के वचनों को स्वीकार करता है और अपने संकल्प के कारण मृत्यु से भी तीन वर अर्जित कर लेता है। 
एक प्रतीक के रूप में यह कथा प्रत्येक मनुष्य के सौभाग्य की कथा है जिसे ओशो ने अग्नि-विद्या के रूप में ‍हमें दिया है। ओशो कहते हैं : ‘यम ने जो नचिकेता को कहा था, वही मैंने आपको कहा है। नचिकेता को जो हुआ, वही आपको भी हो सकता है। लेकिन आपको कुछ करना पड़ेगा, मात्र सुनकर नहीं, उसे जीकर। जो सुना है, उस दिशा में थोड़े प्रयास, थोड़े प्रयत्न, थोड़े कदम उठाकर। बस बैठ न जाएं, सोचने न लगें। जितना हम सोचने में समय गंवाते हैं, उतना प्रयास करने में लगा दें, उतना ध्यान बन जाए, तो मंजिल दूर नहीं है’।

विषय सूची

प्रवचन 1 : जीवन का गुह्यतम केंद्र : मृत्यु 
प्रवचन 2 : मृत्यु-पार की प्रामाणिक राजदां : मृत्यु 
प्रवचन 3 : संन्यास व वैराग्य में हेतुरूपा : मृत्यु 
प्रवचन 4 : नास्तिक का सत्य, आस्तिक का असत्य : मृत्यु 
प्रवचन 5 : सतत अतिक्रमण की प्रक्रिया ही परमात्मा 
प्रवचन 6 : ज्ञान अनंत यात्रा है 
प्रवचन 7 : धर्म का आधार-सूत्र : विवेक 
प्रवचन 8 : धर्म का आधार-सूत्र : मौन
प्रवचन 9 : आत्मज्ञान ही प्रत्यक्ष ज्ञान
प्रवचन 10 : निर्धूम-ज्योति की खोज
प्रवचन 11 : बोध ही ऊर्ध्वगमन 
प्रवचन 12 : परमात्मा एक माध्यमरहित अनुभव
प्रवचन 13 : सत्य की अभिव्यंजना विपरीतताओं में
प्रवचन 14 : परमात्मा : परम तटस्थता 
प्रवचन 15 : अचाह छलांग है प्रभु में
प्रवचन 16 : कामना का विसर्जन ही मृत्यु का विसर्जन 
प्रवचन 17 : अमृत की उपलब्धि मृत्यु के द्वार पर

 

 

 

Kathopanishad

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