• Geeta Darshan-Vol.2

Geeta Darshan-Vol.2 - गीता-दर्शन भाग दो

कृष्ण कहते हैं: ‘जब मनुष्य आसक्तिरहित होकर कर्म करता है, तो उसका जीवन यज्ञ हो जाता है--पवित्र। उससे, मैं का जो पागलपन है, वह विदा हो जाता है। मेरे का विस्तार गिर जाता है। आसिक्त का जाल टूट जाता है। तादात्म्य का भाव खो जाता है। फिर वह व्यक्ति जैसा भी जीए, वह व्यक्ति जैसा भी चले, फिर वह व्यक्ति जो भी करे, उस करने, उस जीने, उस होने से कोई बंधन निर्मित नहीं होते हैं।’ 
ओशो 

इस पुस्तक में गीता के चौथे व पांचवें अध्याय—ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग व कर्म-संन्यास-योग—तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है। 

कुछ विषय-बिंदु:

*निष्काम कर्म का विज्ञान
*जन्मों-जन्मों में कैसे निर्मित होता है मन
*आत्म-ज्ञान के लिए सूत्र
*काम-क्रोध से मुक्ति

विषय सूची

प्रवचन 1: सत्य एक जानने वाले अनेक 
प्रवचन 2: भागवत चेतना का करुणावश अवतरण 
प्रवचन 3: दिव्य जीवन, समर्पित जीवन 
प्रवचन 4: परमात्मा के स्वर 
प्रवचन 5: जीवन एक लीला 
प्रवचन 6: वर्ण-व्यवस्था का मनोविज्ञान 
प्रवचन 7: कामना-शून्य चेतना 
प्रवचन 8: मैं मिटा, तो ब्रह्म 
प्रवचन 9: यज्ञ का रहस्य 
प्रवचन 10: संन्यास की नई अवधारणा 
प्रवचन 11: स्वाध्याय-यज्ञ की कीमिया 
प्रवचन 12: अंतर्वाणी-विध्या 
प्रवचन 13: मृत्यु का साक्षात 
प्रवचन 14: चरण-स्पर्श और गुरु-सेवा 
प्रवचन 15: मोह का टूटना 
प्रवचन 16: ज्ञान पवित्र करता है 
प्रवचन 17: इंद्रियजय और श्रद्धा 
प्रवचन 18: संश्यात्मा विनश्यति 

 

 

 

Geeta Darshan-Vol.2

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